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Saturday, June 15, 2013

उपेक्षित बुजुर्ग 



वाकया कल दोपहर का है। मैं और मेरा एक सहकर्मी सचिवालय से महालेखाकार कार्यालय जा रहे थे ।  बैम्लोई से कुछ आगे एक बजुर्ग महिला गाडियों को रोकने के  लिए हाथ बढ़ा  रही थी । मैंने गाड़ी रोकी तो उसने बस स्टैंड के  गुरुद्वारे तक जाने को कहा । मैंने उसे बिठाया लेकिन गठिये से उसके हाथ पैर इतने जुड़ गए थे कि  मेरे सहकर्मी को उनकी हाथ और टांगों  को गाड़ी के अन्दर सहेज कर बैठाना  पड़ा। महिला पंजाबी में बात कर रही थी तो मैंने भी पूछा ' बीजी कित्थों  रेंदे हो, जुबान बिलकुल स्पष्ट थी 'ऐथे ई' . मेरी इच्छा बहुत कुछ जान लेने की हो रही थी और मैंने फिर पुछा  'की हो गया हत्थां ते पैरां नूँ '   कल्ले क्यों  जा रये हो, कोई नाल नी आया, किन्ने न्याने ने, कदों शिमले  आये सी पैली  वार, कौन रोटी बनान्दा है' .......वगैरा वगैरा . इस डेढ़ किलोमीटर के सफ़र  में समाज के सबसे महत्वपूर्ण लेकिन  उतने ही  उपेक्षित  वर्ग की झलक सामने आई   और साथ ही तथाकथित आधुनिक सुशिक्षित समाज का घिनौना चेहरा । महिला के चार बेटे हैं,  बहुयें  और पोते पोतियां भी । आर्थराइटिस की वजह से उसके हाथ जुड़ गए हैं लेकिन उसे कोई रोटी तक नहीं देता । उसका खाना किसी अन्य व्यक्ति  के रहमो करम पर है  ।  कोई  आता जाता रोटी दे दे तो ठीक नही तो भूखे ही रहना पड़ता है । जहाँ महिला ने अपनों बच्चों को बड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी वहाँ  वही लोग उसे किसी रद्दी अख़बार जैसा समझ रहे हैं । मिट्टी तक को माता मानने वाले मुल्क के बाशिंदे माता  को मिट्टी  में मिलाने में कही कसर नहीं छोड़ रहे हैं। स्थिति अशोभनीय है और शोचनीय भी  । कल  में भी उसी रास्ते पर जाना होगा जिसका हम आज निर्माण करते हैं इस भयावह भविष्य की कल्पना भी रोंगटे खड़े कर देने वाली है 

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