
मौन है सबकुछ
स्तब्ध है मन
कुछ दीपक हैं स्मृति के तुम्हारी
जो जलते हैं बुझते हैं गली में
हमारी
हवा तेज होती जाती है अब
कहीं ये दीपक .........
मेरे स्मृति चिन्ह .........
मेरे स्मृति चिन्ह .........
बुझ न जाएँ
न जाओ दूर
मुझसे
पास बैठो मेरे
डर लगता है इस अकेली रात में
एक आग्रह तो स्वीकार करो
अंधकार में भटकी
अपनी विरहन का
अपनी विरहन का
तुम्हारी यादो के
भुजपाश में बंधकर
भुजपाश में बंधकर
मर जाना चाहती हूँ मैं
................................सिद्धार्थ
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