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Thursday, April 1, 2010

डर



मौन है सबकुछ

स्तब्ध है मन

कुछ दीपक हैं स्मृति  के तुम्हारी

जो जलते हैं   बुझते हैं गली में

  हमारी

हवा तेज होती  जाती है अब

कहीं ये दीपक .........


मेरे स्मृति चिन्ह .........

बुझ न जाएँ

न जाओ दूर
मुझसे

पास बैठो मेरे 

डर लगता है इस अकेली रात में

एक आग्रह तो स्वीकार करो

अंधकार में भटकी


 अपनी विरहन का

तुम्हारी यादो के 


 भुजपाश में बंधकर

मर जाना चाहती हूँ मैं

................................सिद्धार्थ

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